कई बlर शब्दों को पिरोना चाहा ,
कई बार कुछ लिखना चाहा
हर बार कोई वजह बन गई
कलम कागज़ तक आकर रूक गई
क्यों होता रहा आज तक ऐसा ?
इसका कोई जवाब नहीं है
बस इतना पता है कि -
अब ये कलम नहीं रुकेगी
कोई मजबूरी नहीं रहेगी
जो भी लिखना है वो
बस लिखा जायेगा
सिर्फ 'सच ' लिखा जायेगा
ऐ मेरी ' किताब ' तुझे लिखना
सिर्फ मेरी मंजिल नहीं
किसी के पढने से मेरी तारीफ़ नहीं
दिल की बाते है ये जो तुम्हे बतानी है
जीवन का हर हिस्सा तुम्हे दिखाना है
मेरी जिंदगी भी एक 'आम ' जिंदगी है
पर उसमे लोग ख़ास है !
What a reflective poem Deepti..Keep it up!
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